Sunday, October 21, 2012


"गोरख पाण्डेय " की लिखी एक बेमिसाल कविता--


जरूरी कविता


सोचो तो
मामूली तौर पर
जो अनाज उगाते हैं
उन्हें दो जून अन्न
ज़रूर मिलना चाहिए
उनके पास कपडे
ज़रूर होने चाहिए
जो उन्हें बुनते हैं
और उन्हें प्यार मिलना ही चाहिए
जो प्यार करते हैं
मगर सोचो तो
यह भी कितना अजीब है कि
उगाने वाले
भूखें रहते हैं
और उन्हें पचा जाते हैं,
चूहे
और बिस्तरों पर पड़े रहने वाले लोग
बुनकर फटे चीथडों में रहते हैं,
और अच्छे से अच्छे कपडे
प्लास्टिक की मूर्तियाँ पहने होती हैं
गरीबी में
प्यार भी नफरत करता हैं
और पैसा
नफरत को भी
प्यार में बदल देता है.

गोरख पांडेय

1 comment:

Ramji Giri said...

नमन कवि को !!!