ये चंद एक पंक्तियाँ है , जो मैंने त्रिवेणी community पर लिखी थी .....
1.सारी रात आसमाँ पर चलते रहे,
बेशुमार सितारों से मिलते रहे ,
खुदा फिर भी ना मिला।
2.इतनी बेरहमी,बेशर्मी,कत्ले-आम ,
कैसे करे खुदा तेरा एहतराम;
तमाशा क्यों करे है सरे-आम।
Sunday, December 9, 2007
Sunday, December 2, 2007
"मुमताज़ के ख्वाब पर"
जब भी नज़र जाती है ताज पर
अटकी सी जाती है
सीने मे सांस,
एक मुमताज़ के ख्वाब पर
टूट गई होंगी
ना जाने
कितने घरों की आस.
अटकी सी जाती है
सीने मे सांस,
एक मुमताज़ के ख्वाब पर
टूट गई होंगी
ना जाने
कितने घरों की आस.
Tuesday, November 27, 2007
कवि नवीन सागर की बेमिसाल लेखनी
नवीन सागर की इस गाँधी वादी रचना से मेरी मुलाक़ात यहाँ के स्थानीय दैनिक अख़बार--अमर उजाला-के आखर पन्ने पर हुई .मैंने सोचा की आप सब को भी रूबरू करूं बेमिसाल पंक्तियों से ------
जिसने मेर घर जलाया
उसे इतना बड़ा घर देना
कि बाहर निकलने को चले
पर निकल ना पाए
जिसने मुझे मारा
उसे सब देना
मृत्यु ना देना
जिसने मेरी रोटी छीनी
उसे रोटियों के समुद्र मे फ़ेकना
तूफ़ान उठाना
मै नहीं मिला उनसे मिलवाना
मुझे इतनी दूर छोड़
कि बराबर संसार मे आता रहूं।
जिसने मेर घर जलाया
उसे इतना बड़ा घर देना
कि बाहर निकलने को चले
पर निकल ना पाए
जिसने मुझे मारा
उसे सब देना
मृत्यु ना देना
जिसने मेरी रोटी छीनी
उसे रोटियों के समुद्र मे फ़ेकना
तूफ़ान उठाना
मै नहीं मिला उनसे मिलवाना
मुझे इतनी दूर छोड़
कि बराबर संसार मे आता रहूं।
Saturday, November 24, 2007
साँझ गुलाबी सी"
कभी लगता है
उगी है ओस की बूंदे
दिल की ज़मीं पर ,
या
कर रही अठखेलियाँ
किरणे सुबह की
उजास उमंग लहरों पर.
कभी लगता है
भ्रम तो नहीं ये मिलना
जैसे आसमां और ज़मीं
मिलते है रोज़
उस क्षितिज पर.
कभी लगता है
तेरा मेरा मिलना
है जैसे मिल रही
नदी सागर से ,
या
है यह इक
साँझ गुलाबी सी
दिन और रात
मिलते जहा पर ..
उगी है ओस की बूंदे
दिल की ज़मीं पर ,
या
कर रही अठखेलियाँ
किरणे सुबह की
उजास उमंग लहरों पर.
कभी लगता है
भ्रम तो नहीं ये मिलना
जैसे आसमां और ज़मीं
मिलते है रोज़
उस क्षितिज पर.
कभी लगता है
तेरा मेरा मिलना
है जैसे मिल रही
नदी सागर से ,
या
है यह इक
साँझ गुलाबी सी
दिन और रात
मिलते जहा पर ..
Sunday, November 18, 2007
"अनबूझ प्यास"
ना जाने कैसी है
सदियों से
अनबूझ
ये प्यास तुम्हारी,
जड़ - चेतन
जीवित स्पंदन से
सदा आलोड़ित
धरा हमारी,
फिर भी
अनंत व्योम में
किस मारीचिका की
तलाश है तुम्हारी .
हैरान है
इस बौद्धिक खेल से
अब तक मानवता सारी,
पर
चांद-तारों पर टिकी है
अब नज़र तुमहारी
उनके चैन छिनने की
अब है बारी.
Thursday, September 27, 2007
MY SNAP RESPONSES
1.Mat karo khusi ki talash,
zara usko pehchano...
marichika hai sapno ki duniya,
bus khud ko jano.
2.Gam ko karo delete,
Khushi ko karo save,
A brush wid insanity,
Dats i wanna have.
3.आंखें बंद हों ,तो दिल का दिया जलाये रखिये.
खुद से अंधेरे को परे हटाये रखिये.
उजाला ज़रूरी है,उससे दोस्ती बनाए रखिए.
4.कभी साहिल -सा दिखता कभी समन्दर- सा
,सूरज की किरचें चुभती रही आँखों में,
या फिर इक चादर -सी धुंध थी छाई..
zara usko pehchano...
marichika hai sapno ki duniya,
bus khud ko jano.
2.Gam ko karo delete,
Khushi ko karo save,
A brush wid insanity,
Dats i wanna have.
3.आंखें बंद हों ,तो दिल का दिया जलाये रखिये.
खुद से अंधेरे को परे हटाये रखिये.
उजाला ज़रूरी है,उससे दोस्ती बनाए रखिए.
4.कभी साहिल -सा दिखता कभी समन्दर- सा
,सूरज की किरचें चुभती रही आँखों में,
या फिर इक चादर -सी धुंध थी छाई..
Sunday, September 9, 2007
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