Sunday, November 18, 2007
"अनबूझ प्यास"
ना जाने कैसी है
सदियों से
अनबूझ
ये प्यास तुम्हारी,
जड़ - चेतन
जीवित स्पंदन से
सदा आलोड़ित
धरा हमारी,
फिर भी
अनंत व्योम में
किस मारीचिका की
तलाश है तुम्हारी .
हैरान है
इस बौद्धिक खेल से
अब तक मानवता सारी,
पर
चांद-तारों पर टिकी है
अब नज़र तुमहारी
उनके चैन छिनने की
अब है बारी.
Thursday, September 27, 2007
MY SNAP RESPONSES
1.Mat karo khusi ki talash,
zara usko pehchano...
marichika hai sapno ki duniya,
bus khud ko jano.
2.Gam ko karo delete,
Khushi ko karo save,
A brush wid insanity,
Dats i wanna have.
3.आंखें बंद हों ,तो दिल का दिया जलाये रखिये.
खुद से अंधेरे को परे हटाये रखिये.
उजाला ज़रूरी है,उससे दोस्ती बनाए रखिए.
4.कभी साहिल -सा दिखता कभी समन्दर- सा
,सूरज की किरचें चुभती रही आँखों में,
या फिर इक चादर -सी धुंध थी छाई..
zara usko pehchano...
marichika hai sapno ki duniya,
bus khud ko jano.
2.Gam ko karo delete,
Khushi ko karo save,
A brush wid insanity,
Dats i wanna have.
3.आंखें बंद हों ,तो दिल का दिया जलाये रखिये.
खुद से अंधेरे को परे हटाये रखिये.
उजाला ज़रूरी है,उससे दोस्ती बनाए रखिए.
4.कभी साहिल -सा दिखता कभी समन्दर- सा
,सूरज की किरचें चुभती रही आँखों में,
या फिर इक चादर -सी धुंध थी छाई..
Sunday, September 9, 2007
Sunday, July 8, 2007
"कोहरे-सी यादें तुम्हारी"
एक दिन कोहरे से गुजरते हुए मैने तुम्हे महसूस किया........
कोहरे से गुजरता हूँ
जैसे तेरी यादों का मंजर
न इसका अन्त है न यादों का,
हर दो कदम पर
दरख्तों-सी तुम,
धुंधली नम हवा की
चादर ओढ़े;
पल-पल होना तुम्हारा
मेरे साथ मेरे पास.
नही निकली जमाने की धूप,
कोहरा ओढ़े तेरी यादों की
सपनों मे रहा दिन भर.
कोहरे से गुजरता हूँ
जैसे तेरी यादों का मंजर
न इसका अन्त है न यादों का,
हर दो कदम पर
दरख्तों-सी तुम,
धुंधली नम हवा की
चादर ओढ़े;
पल-पल होना तुम्हारा
मेरे साथ मेरे पास.
नही निकली जमाने की धूप,
कोहरा ओढ़े तेरी यादों की
सपनों मे रहा दिन भर.
Tuesday, June 12, 2007
अज्ञॆय जी की एक अनोखी रचना से मैं रू-बरू हुआ आज.....
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सो रहा है झोंप अंधियारा नदी की जांघ पर
डाह से सिहरी हुयी वह चॉदनी
चोर पैरों से उलझकर झांक जाती है.
प्रस्फ़ुटन के दो क्षणो का मोल शेफ़ाली
विजय की धूल पर चुपचाप
अपने मुग्ध प्राणों से
अजाने ऑक जाती है.
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सो रहा है झोंप अंधियारा नदी की जांघ पर
डाह से सिहरी हुयी वह चॉदनी
चोर पैरों से उलझकर झांक जाती है.
प्रस्फ़ुटन के दो क्षणो का मोल शेफ़ाली
विजय की धूल पर चुपचाप
अपने मुग्ध प्राणों से
अजाने ऑक जाती है.
Monday, June 4, 2007
'उन लम्हों की खातिर'
अपनी मौत नहीं
उसकी खुशियॉ मांगे,
जिसके सांसों की
खुश्बू
आज भी है ,
सांसों में
आती-जाती
यादें उसकी
सांसों की.
वो जो
दो कदम
साथ चले थे,
नये मायने मिले
ज़िन्दगी को.
शुक्रिया
उन लम्हों की खातिर,
जो हसीन थे
दोनो के लिए.
उसकी खुशियॉ मांगे,
जिसके सांसों की
खुश्बू
आज भी है ,
सांसों में
आती-जाती
यादें उसकी
सांसों की.
वो जो
दो कदम
साथ चले थे,
नये मायने मिले
ज़िन्दगी को.
शुक्रिया
उन लम्हों की खातिर,
जो हसीन थे
दोनो के लिए.
Tuesday, May 1, 2007
'वो दरिया'
चलते रहे सारी उम
साथ -साथ
समानान्तर,
हम दरिया के
दो किनारे.
और
वो दरिया
हमें
ज़ुदा सा
साथ रखने की
साथ -साथ
समानान्तर,
हम दरिया के
दो किनारे.
और
वो दरिया
हमें
ज़ुदा सा
साथ रखने की
लहरों से बांधता रहा.
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