Sunday, July 8, 2007

"कोहरे-सी यादें तुम्हारी"

एक दिन कोहरे से गुजरते हुए मैने तुम्हे महसूस किया........

कोहरे से गुजरता हूँ
जैसे तेरी यादों का मंजर
न इसका अन्त है न यादों का,
हर दो कदम पर
दरख्तों-सी तुम,
धुंधली नम हवा की
चादर ओढ़े;
पल-पल होना तुम्हारा
मेरे साथ मेरे पास.
नही निकली जमाने की धूप,
कोहरा ओढ़े तेरी यादों की
सपनों मे रहा दिन भर.

Tuesday, June 12, 2007

अज्ञॆय जी की एक अनोखी रचना से मैं रू-बरू हुआ आज.....
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सो रहा है झोंप अंधियारा नदी की जांघ पर
डाह से सिहरी हुयी वह चॉदनी
चोर पैरों से उलझकर झांक जाती है.

प्रस्फ़ुटन के दो क्षणो का मोल शेफ़ाली
विजय की धूल पर चुपचाप
अपने मुग्ध प्राणों से
अजाने ऑक जाती है.

Monday, June 4, 2007

'उन लम्हों की खातिर'

अपनी मौत नहीं
उसकी खुशियॉ मांगे,
जिसके सांसों की
खुश्बू
आज भी है ,
सांसों में
आती-जाती
यादें उसकी
सांसों की.
वो जो
दो कदम
साथ चले थे,
नये मायने मिले
ज़िन्दगी को.
शुक्रिया
उन लम्हों की खातिर,
जो हसीन थे
दोनो के लिए.

Tuesday, May 1, 2007

'वो दरिया'

चलते रहे सारी उम
साथ -साथ
समानान्तर,
हम दरिया के
दो किनारे.
और
वो दरिया
हमें
ज़ुदा सा
साथ रखने की
लहरों से बांधता रहा.

Sunday, April 29, 2007

' दस्तक'

कोई हमें एकदम भूल जाए
चाहे तो सारे खत जलाए
पर उन हवाओं की तासीर का क्या
जो सदियों तक
हमारे दर्द से सर्द होकर
वक्त बे-वक्त
दस्तक देती रहेगीं
सबके  दिलों पर.

'इश्क़ के अलावा भी'

क्यों मिटा दें खाक़ में खुद को
फ़क़त किसी के अक्स की याद मे,
इश्क़ के अलावा भी
बहुत काम है,
जिसका हिसाब देना है
बन्दे को खुदा केदर पे.

'खामोशी'

खमोशी का भी एक
अलग सुरूर है,
पर ऐसे मे
आपका दिल
आपकी बात सुने.
तो उनका बाद मे
आना भी मंजूर है.
पर इस दिल को
समझाऊं कैसे,
उनकी याद मे
मचलता ज़रूर है.
मैं, मेरा दिल
और ये खामोशी
आपके इन्तज़ार मे हज़ूर है.